Sunday, April 19, 2015

कवि परत आले !



ramdas athawale kavita poem


कोकण में पिकता है हापूस
विदर्भ में बनता है कापूस
पूरी करो मेरी मंञीपद की हाउस
नहीं तो ऐसेच पडेगा बीच बीच में पाउस
कवि परत आले
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